जमाबंदी पंजी का नया अवतार: बिहार दाखिल-खारिज नियमावली का प्रपत्र -II


बिहार भूमि दाखिल-खारिज नियमावली, 2012 के तहत संधारित की जाने वाली पंजी-II (अंचल खाता पंजी या जमाबंदी पंजी) का नया प्रारूप राज्य के राजस्व प्रशासन को पारदर्शी, वैज्ञानिक और आधुनिक बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। जमींदारी उन्मूलन के बाद से लागू पुरानी व्यवस्था (खास महल हस्तक के प्रपत्रों) की गंभीर त्रुटियों को दूर करते हुए इस नए प्रारूप को विशेष रूप से डिजाइन किया गया है, ताकि भूमि विवादों को जड़ से खत्म किया जा सके।
          
बिहार दाखिल-खारिज नियमावली: पंजी-II के नए प्रारूप की विशेषताएँ भूमि की सटीक पहचान: खाता, खेसरा, रकबा और चौहद्दी
इस नए प्रारूप की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें जमीन के प्रत्येक टुकड़े की पहचान को पूरी तरह अकाट्य बना दिया गया है। नई पंजी-II में निम्नलिखित विवरणों के लिए विशिष्ट और समर्पित कॉलम दिए गए हैं:
  • खाता और प्लॉट (खेसरा) नंबर: प्रत्येक रैयत की जमीन के लिए स्पष्ट खाता और विशिष्ट प्लॉट नंबर दर्ज करने का अलग कॉलम है।
  • प्लॉट-वार रकबा (क्षेत्रफल): पुरानी व्यवस्था की तरह कुल एकमुश्त जमीन लिखने के बजाय, अब प्रत्येक अलग-अलग प्लॉट (खेसरा) के सामने उसका अपना सटीक क्षेत्रफल (प्लॉट-वार रकबा) दर्ज करना अनिवार्य है।
  • प्लॉट-वार चौहद्दी: जमीन की भौतिक सीमा तय करने के लिए प्लॉट के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की सीमाओं (चौहद्दी) को दर्ज करने का वैधानिक कॉलम है। जमीन की बिक्री या बंटवारे के कारण सीमा बदलने पर प्रपत्र में 'संशोधित नई चौहद्दी' दर्ज करने का भी विशेष प्रावधान है।
हस्तांतरण का सटीक संदर्भ: अंश का आना और जाना
नई पंजी-II की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका नामांतरण (दाखिल-खारिज) संदर्भ कॉलम है। जब भी किसी भूखंड का हस्तांतरण होता है, तो यह प्रपत्र केवल आदेश संख्या लिखकर नहीं रुकता, बल्कि गहन तकनीकी विवरण दर्ज करता है:
  • यदि किसी मूल जमाबंदी से जमीन का कोई अंश कटकर किसी नए खरीदार या हिस्सेदार के पास जा रहा है, तो वह किस नई जमाबंदी संख्या पर जा रही है, इसका स्पष्ट उल्लेख करना अनिवार्य है।
  • ठीक इसी प्रकार, यदि किसी रैयत की जमाबंदी में कोई नया भूखंड या उसका अंश जुड़ रहा है, तो वह किस पुरानी जमाबंदी संख्या से कटकर आ रही है, उस पिछली जमाबंदी का पूरा कानूनी संदर्भ दर्ज किया जाता है।
भूमि के भूखंड-वार विवरण (खाता, खेसरा, रकबा, चौहद्दी) और हस्तांतरण के समय जमीन के अंश के आने-जाने (जमाबंदी संदर्भ) को आपस में पूरी तरह जोड़ देने के कारण इस नए प्रारूप में राजस्व रिकॉर्ड में मानवीय या लिपिकीय त्रुटि रहने की संभावना न्यूनतम (कम से कम) हो गई है। यह नया स्वरूप बिहार में एक स्वच्छ और विवाद-मुक्त भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था का मुख्य आधार है।

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