आबाद-बेशी : राजस्व प्रशासन की प्रारंभिक शब्दावली
आबाद-बेशी ऐतिहासिक भारतीय भू-राजस्व व्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट प्रशासनिक शब्द है जो मुख्य रूप से नए कृषि क्षेत्रों के विकास और राज्य की आय वृद्धि से जुड़ा हुआ है। यह शब्द मूल रूप से दो शब्दों के मेल से बना है जिसमें आबाद का अर्थ किसी बंजर या जंगली भूमि को साफ करके उसे खेती योग्य या रहने योग्य बनाना होता है और बेशी का अर्थ उस प्रक्रिया से होने वाली राजस्व या कर की वृद्धि से है। तत्कालीन समय में जब कोई किसान या समुदाय किसी उजाड़ और वीरान पड़ी जमीन को अपने कठिन परिश्रम से कृषि योग्य भूमि में तब्दील करता था तो उस भूखंड पर राज्य द्वारा जो सबसे पहला कर निर्धारण या लगान तय किया जाता था उसे ही आबाद-बेशी कहा जाता था। यह व्यवस्था एक तरह से भूमि के रूपांतरण और उस पर राज्य के प्रथम वित्तीय अधिकार को प्रमाणित करती थी क्योंकि इसके लागू होते ही वह नई भूमि आधिकारिक तौर पर सरकारी राजस्व अभिलेखों और खतौनी का हिस्सा बन जाती थी। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य न केवल राज्य के खजाने को बढ़ाना था बल्कि दूरदराज के क्षेत्रों में कृषि विस्तार और नई बसावटों को बढ़ावा देना भी था ताकि अधिक से अधिक बंजर भूमि को उत्पादक बनाया जा सके और देश की आर्थिक संप्रभुता को सुदृढ़ किया जा सके। यह कर प्रणाली यह भी दर्शाती है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत में प्रशासनिक तंत्र किस प्रकार भूमि के स्वामित्व और खेती की शुरुआत के बारीक कानूनी पहलुओं को समझता था और उन्हें एक व्यवस्थित ढांचे में दर्ज करता था।
संदर्भ: विल्सन ग्लॉसरी 1855
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